हिंदी दिवस (सितम्बर १४) के अवसर पर
श्रीमद्भगवद्गीता का परायण
अथ प्रथमोध्यायः
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।। १।।
(धृतराष्ट्र बोले - हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इक्षा से इकट्ठे हुए मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने भी क्या किया ?)
संजय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वाचणमब्रवीत।। २।।
(संजय बोले - उस समय वज्रब्यूह से खड़ी हुई पांडव सेना को देखकर राजा दुर्योधन द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन बोला। )
पश्यैतां पाण्डुपुत्रनामाचार्य महातीं चामूम।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता।। ३।।
(हे आचार्य ! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र दृष्टध्युम्न के द्वारा व्यूहरचना से खड़ी की हुई पांडवों की इस भारी सेना को देखिये। )
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः।। ४।।
दृदष्टकेतुश्चेकितान: कशिराजश्च वीर्यवान।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैव्यश्च नरपुंगवः।। ५।।
युधामन्युश्च विक्रांत उत्तमौजाश्च वीर्यवान।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः।। ६।।
(यहां (पांडवों की सेना में) बड़े-बड़े शूरवीर हैं, जिनके बहुत बड़े-बड़े धनुष हैं तथा जो युद्ध में भीम और अर्जुन के समान हैं। उनमे युयुधान (सात्यकि), राजा विराट और महारथी द्रुपद भी हैं। दृष्टकेतु और चेकितान तथा पराक्रमी काशिराज भी हैं। पुरुजित और कुन्तिभोज -ये दोनों भाई तथा मनुष्यों में श्रेष्ठ शैव्य भी हैं। पराक्रमी युधामन्यु और पराक्रमी उत्तमौजा भी हैं। सुभद्रपुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पांचो पुत्र भी हैं। ये सब-के-सब महारथी हैं।)
(क्रमशः)

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