गुरुवार, 15 सितंबर 2022

श्रीमद्भगवद्गीता


अथ प्रथमोध्यायः 


अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।  

नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थ तान्ब्रवीमि ते।। ७।। 


(हे द्विजोत्तम ! हमारे पक्ष में भी जो मुख्य हैं, उनपर भी आप ध्यान दीजिये।  आपको याद दिलाने के लिए मेरी सेना में जो नायक हैं, उनको मैं कहता हूँ।)


भवान्भीष्मश्च करणश्च कृपश्च समितिञ्जयः।  

अश्वस्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च।। ८।। 


(आप (द्रोणाचार्य) और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वस्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा।)


अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।  

नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः।। ९।। 


(इनके अतिरिक्त बहुत से शूरवीर हैं, जिन्होंने मेरे लिए अपने जीने की इक्षा का भी त्याग कर दिया है और जो अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को चलनेवाले हैं तथा सब के सब युद्धकला में अत्यंत चतुर हैं।)


अप्रयाप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम। 

पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं  भीष्माभिरक्षितम।। १०।। 


(वह हमारी सेना पांडवों पर विजय करने में अपर्याप्त है, असमर्थ है; क्योंकि उसके संरक्षक (उभयपक्षपाती) भीष्म हैं।  परन्तु इन पांडवों की सेना हमारे पर विजय करने में पर्याप्त है, समर्थ है; क्योंकि इसके संरक्षक (निजसेनापक्षपाती) भीमसेन हैं।)       


(क्रमशः)     


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